
हरि न्यूज
लेखक:-डॉ. गरिमा भाटी
देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षाओं में से एक NEET का बार-बार पेपर लीक होना केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि लाखों युवाओं के विश्वास पर सीधा प्रहार है। यह प्रश्न आज हर नागरिक के मन में है कि जब हमारे पास विशाल प्रशासनिक ढांचा, खुफिया तंत्र, सुरक्षा एजेंसियाँ और तकनीकी संसाधन मौजूद हैं, तब भी परीक्षा पत्र लीक होने की घटनाएँ क्यों नहीं रुक रहीं? आखिर इस पूरे तंत्र में ऐसी कौन-सी दरार है, जहाँ से हर वर्ष लाखों विद्यार्थियों का भविष्य रिस जाता है? इस पेपर लीक ने केवल एक परीक्षा को प्रभावित नहीं किया, बल्कि उन लाखों मेहनती विद्यार्थियों की आशाओं को तोड़ा है, जिन्होंने दिन-रात एक करके अपनी तैयारी की थी। कितने पिता अपनी संतानों की सफलता के सपने आँखों में लिए बैठे थे, कितनी माताएँ घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियाँ पीछे छोड़कर अपने बच्चों के साथ तैयारी में जुटी थीं, कितने परिवारों ने अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च कर कोचिंग, किताबें और संसाधन जुटाए थे। आज उनके सामने केवल एक प्रश्न है उनके खोए हुए समय, संसाधनों, मानसिक शांति और टूटे हुए उत्साह की भरपाई कौन करेगा? कुछ लोग कह सकते हैं कि परीक्षा दोबारा हो जाएगी। लेकिन क्या टूटा हुआ मनोबल भी इतनी आसानी से लौट आता है? क्या दोबारा वही ऊर्जा, वही आत्मविश्वास, वही मानसिक संतुलन फिर से जुटाया जा सकता है? एक परीक्षा की तैयारी केवल किताबें पढ़ लेने का नाम नहीं होती; इसके पीछे महीनों की मानसिक तपस्या, सामाजिक त्याग और आर्थिक संसाधनों की खपत होती है। बार-बार परीक्षा स्थगित होना या पेपर लीक होना संसाधनों की बर्बादी ही नहीं, युवाओं के धैर्य और भरोसे की हत्या है। सबसे गंभीर बात यह है कि हर बार घटना के बाद जांच, गिरफ्तारी और आश्वासन की औपचारिकताएँ पूरी हो जाती हैं, लेकिन मूल प्रश्न वहीं रह जाता है कि जिम्मेदार कौन? जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, जब तक व्यवस्था में पारदर्शिता और कठोर दंड का भय स्थापित नहीं होगा, तब तक हर अगला पेपर किसी अगली पीढ़ी के सपनों को कुचलने के लिए तैयार खड़ा होगा। शिक्षा व्यवस्था केवल परीक्षा आयोजित करने का माध्यम नहीं, बल्कि युवाओं के विश्वास का स्तंभ है। यदि यह स्तंभ ही कमजोर पड़ जाए, तो राष्ट्र का भविष्य भी डगमगाने लगता है। अब समय आ गया है कि जवाबदेही तय हो, दोषियों को सजा मिले और ऐसी व्यवस्था बने जहाँ मेहनत का मूल्य हो, न कि पैसों और पहुंच का। क्योंकि जब सपने बार-बार टूटते हैं, तो केवल एक छात्र नहीं हारता, पूरा देश हारता है।
