
लेखिका :जूही अग्रहरी
कोलकाता
कुछ रिश्ते दुनिया को कभी समझ नहीं आते।
उनका कोई नाम नहीं होता, कोई पहचान नहीं होती… फिर भी वो दिल के सबसे करीब होते हैं।
मेरा रिश्ता भी कुछ ऐसा ही है — चाँद से।
मुझे रातें हमेशा से पसंद रही हैं।
दिन की भीड़, लोगों की आवाज़ें, दुनिया की उलझनें… ये सब मुझे अक्सर थका देती हैं।
लेकिन जैसे ही रात उतरती है, सब कुछ शांत होने लगता है।
और फिर आसमान में धीरे-धीरे चाँद निकलता है… बिल्कुल मेरी तरह खामोश।
ना जाने क्यों, मुझे घंटों अकेले बैठकर चाँद को देखना अच्छा लगता है।
ऐसा लगता है जैसे वो मुझे समझता है।
मेरी बातें सुने बिना भी सुन लेता है।
मेरे अंदर के शोर को बिना बोले महसूस कर लेता है।
कई बार मैं अंधेरे में बैठी रहती हूँ, चारों तरफ सन्नाटा होता है, सिर्फ हवा चल रही होती है… और सामने चाँद।
उस पल ऐसा लगता है जैसे पूरी दुनिया रुक गई हो।
ना किसी से शिकायत रहती है, ना किसी से उम्मीद।
बस मैं होती हूँ… और वो चाँद।
लोग कहते हैं चाँद सबका होता है,
लेकिन मुझे हमेशा लगा वो थोड़ा सा मेरा भी है।
क्योंकि जब सब साथ छोड़ देते हैं, तब भी वो हर रात लौट आता है।
उसी चमक के साथ… उसी अपनापन के साथ।
मैंने अक्सर अपनी उदासी चाँद में छुपाई है।
जब दिल बहुत भरा होता है, तब मैं आसमान देखने लगती हूँ।
और सच कहूँ, कई बार ऐसा लगा जैसे चाँद भी उदास था।
जैसे वो भी किसी का इंतज़ार कर रहा हो।
शायद इसी लिए मुझे उससे इतना लगाव है।
हम दोनों अधूरे से लगते हैं।
वो भी हर रात पूरा नहीं होता…
और मैं भी हर दिन खुद को पूरा महसूस नहीं करती।
कभी-कभी मैं सोचती हूँ,
अगर चाँद बोल पाता तो क्या कहता?
शायद वो भी अपनी तन्हाई सुनाता।
शायद वो भी बताता कि सब उसे दूर से पसंद करते हैं,
लेकिन कोई उसके पास नहीं होता।
मुझे तारों को देखना भी बहुत पसंद है।
छोटे-छोटे चमकते तारे… जैसे अंधेरों में उम्मीद के टुकड़े।
उनको देखकर लगता है कि अगर आसमान इतनी रात के बाद भी चमक सकता है,
तो इंसान की ज़िंदगी भी फिर से रोशन हो सकती है।
रात मुझे डराती नहीं।
बल्कि रात मुझे अपनापन देती है।
अंधेरे में बैठकर चाँद को देखना मेरे लिए सिर्फ एक आदत नहीं… एक एहसास है।
एक ऐसी जगह, जहाँ मैं बिना डरे खुद जैसी हूँ वैसी रह सकती हूँ।
बहुत लोग खुश रहने के लिए भीड़ ढूंढते हैं,
और मैं सुकून ढूंढती हूँ रात के आसमान में।
क्योंकि वहाँ कोई सवाल नहीं होते।
कोई दिखावा नहीं होता।
बस खामोशी होती है… और उस खामोशी में छुपा एक अजीब सा सुकून।
शायद इसलिए मेरा दिल चाँद से जुड़ा हुआ लगता है।
क्योंकि वो भी दूर रहकर रोशनी देता है।
खुद अधूरा होकर भी दूसरों की रातें खूबसूरत बना देता है।
और सच कहूँ…
जब मैं देर रात अकेले बैठकर चाँद को देखती हूँ,
तो ऐसा लगता है जैसे कोई मुझे चुपचाप गले लगा रहा हो।
बिना छुए… बिना बोले… सिर्फ एहसास से। ✨
मैने देखा है मौसम को मेरे मिजाज के साथ बदलते …कोई नही समझेगा पर सच कहु
मेरा बहुत गहरा रिस्ता है इस आसमान से चांद से इन हवाओं से जो मुझे सुनती है , उनको मै समझती हु ।।
