
लेखिका जूही अग्रहरी
कोलकाता
मैं प्रेम से भी ज़्यादा प्रेम करूँगी तुम्हें,
तुम आना मेरे पास, मैं इंतज़ार करूँगी ,
अनदेखा करके सारी दुनिया को,
बस तुम्हें ही देखा करूँगी मै ,
तुम्हें ख़ुद से भी ज़्यादा चाहूँगी,
हर दुआ में सिर्फ़ माँगा करूँगी तुम्हें।
मेरी हर सुबह का नूर बन जाना तुम ,
मैं हर शाम में सोचा करूँगी मै तुम्हें।
जब चाँद अकेला निकलेगा रातों में,
मैं उसमें भी ढूँढा करूँगी तुम्हें।
मेरे दिल की खामोश दहलीज़ पर,
हर रोज़ महसूस किया करूँगी तुम्हें।
तुम दूर भी हुए तो क्या हुआ,
अपनी साँसों में रखा करूँगी तुम्हें।
मैं हवा बनकर छू लूँगी तुम्हें,
तुम बारिश बनकर भीगाना जाना मुझें ।
मेरी आँखों की गहराई में उतरकर,
ख़ुद से भी ज़्यादा चाहना तुम मुझे।
ये इश्क़ सिर्फ़ लफ़्ज़ों तक ना रहे,
रूह से रूह तक जोड़ा करना तुम मुझे
मैं टूट भी जाऊँ कभी अगर,
अपनी बाँहों में भर लेना मुझे।
तुम मेरी अधूरी सी दुआ बन जाना,
मैं हर सजदे में माँगा करूँगी तुम्हें।
ना सोना चाहूँ, ना चाँद चाहूँ,
बस अपनी दुनिया बना लूँ तुम्हें।
मेरी धड़कनों की हल्की सी सदा हो तुम,
मैं हर धड़कन में सुना करूँगी तुम्हें।
जब वक़्त हमें दुनिया से छुपा देगा,
मैं यादों में जिया करूँगी तुम्हें।
मैं प्रेम से भी ज़्यादा प्रेम करूँगी मै तुम्हें,
तुम बस एक बार अपना कह देना मुझे।।
