
*कटी पतंग – एक और गहरी छुअन*
वो कोई पतंग नहीं थी
वो तो एक सपना थी-
जिसे बचपन ने
नीले आसमान पर लिख दिया था.
उसके हाथों ने भी कभी
अपनी डोर-
जिससे वो बांधती थी,
अपने अरमान, अपनी हँसी,
अपने नन्हें-नन्हें ख्वाब.
फिर एक दिन
किसी ने कहा-
‘उड़ना है तो हमारे हिसाब से उड़ो,’
और उसी पल
उसकी डोर किसी और के
हाथ में चली गई.
धीरे-धीरे
उसकी उड़ान का रंग फीका पड़ने लगा,
हवा भी अब उसकी नहीं रही,
और फिर-
एक खामोश झटके में
वो कटी पतंग बन गई.
गिरती नहीं है वो-
बस ठहर जाती है कहीं,
किसी छत के कोने में,
जहाँ लोग उसे देख
थोड़ी देर को मुस्कुरा देते हैं,
पर कोई ये नहीं पूछता-
कि उसकी ख़ामोशी में,
कितना शोर छुपा है?
हर रात
वो खुद से पूछती है-
क्या सच में डोर का होना हीं
उड़ान कि शर्त है?
और फिर
एक दिन
अपने हीं टूटे किनारों को समेटकर
वो समझ जाती है-
कि उसे अब
किसी और की
उँगलियों का सहारा नहीं चाहिए,
उसे अब
हवाओं से इजाजत नहीं लेनी.
वो फिर उड़ती है-
इस बार पतंग बनकर नहीं,
बल्कि हवा बनकर-
जहाँ कोई डोर नहीं होती
कोई बंधन नहीं होता
सिर्फ एक एहसास होता है-
खुद होने का.
और तब
वो कटी पतंग नहीं रहती,
वो बन जाती है-
एक ऐसी उड़ान
जिसे कोई काट नहीं सकता..
डॉ.पल्लवी सिंह ‘अनुमेहा ‘
लेखिका एवं कवयित्री
बैतूल, मध्यप्रदेश
