
स्त्री:उड़ान अपने अस्तित्व की”
स्त्री को कैद मत करो रिश्तों की दीवारों में,
लेखिका जूही अग्रहरी
कोलकाता
वो नदी है… उसे बहना आता है।
उसके पंख काटकर मत कहो कि “उड़ो”,
उसे खुला आसमान चाहिए, इजाज़त नहीं।
वो सिर्फ़ किसी की बेटी, पत्नी या माँ नहीं,
वो स्वयं में एक सम्पूर्ण संसार है।
जिस दिन स्त्री अपनी खामोशी तोड़ देगी,
उस दिन कई सदियों का अंधेरा टूट जाएगा।
उसे सम्मान दो, क्योंकि
जो स्त्री खुद के लिए जीना सीख जाती है,
वो पूरी दुनिया को जीना सिखा देती है।
स्त्री की स्वतंत्रता कोई विद्रोह नहीं,
वो उसकी साँसों का अधिकार है।
वो जब अपने फैसले खुद लेने लगती है,
तभी सच में जन्म लेती है।
मत बाँधो उसे “लोग क्या कहेंगे” की ज़ंजीरों में,
क्योंकि एक स्वतंत्र स्त्री ही
सबसे सुंदर कविता होती है।
