
हरि न्यूज
लेखक:भगवान दास शर्मा “प्रशांत”
इटावा उत्तर प्रदेश
आधुनिक समाज में पति-पत्नी के संबंधों में प्रेम प्रगाढ़ता समता और समझदारी तो बढ़ी है, परन्तु साथ ही अहंकार, अपेक्षाएँ, समय की कमी और संवादहीनता के कारण विवाद भी बढ़ते जा रहे हैं। जब परिवारों में कलह बढ़ती है, तब उसका प्रभाव बच्चों, समाज और संस्कारों पर भी पड़ता है। पति-पत्नी को प्रतिदिन कुछ समय एक-दूसरे के साथ शांतिपूर्वक बातचीत में बिताना चाहिए। बिना सुने निर्णय लेना झगड़ों को बढ़ाता है। “मैं ही सही हूँ” की भावना रिश्तों को तोड़ती है। दांपत्य में जीतने से अधिक आवश्यक है संबंध को बचाना, बच्चों के सामने कटु वचन, अपमान और झगड़े नहीं होने चाहिए। घर का वातावरण से ही आने वाली पीढ़ी के संस्कार बनाते है। प्रतिदिन पूजा, प्रार्थना, भजन या धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन मन को शांत करता है। परिवार में आध्यात्मिक वातावरण प्रेम और धैर्य बढ़ाता है। इसलिए परिवार में धार्मिक अनुष्ठान और पूजा पाठ बहुत जरूरी है। हमे चाहिए कि हम सोशल मीडिया और दिखावे से दूरी बनाए। आज अनेक विवाद तुलना और दिखावे से उत्पन्न होते हैं। दूसरों का जीवन देखकर अपने परिवार में असंतोष पैदा करना उचित नहीं। पति-पत्नी दोनों को एक-दूसरे के कार्य, भावनाओं और परिश्रम का सम्मान करना चाहिए। सम्मान से ही विश्वास जन्म लेता है। क्रोध के समय कठोर शब्द बोलने से रिश्तों में दूरी आती है। शांत होकर समस्या का समाधान करना, संयुक्त परिवार और बुजुर्गों का मार्गदर्शन भी परिवार के संस्कारों और प्रेम को संभाले रखता है।
बुजुर्गों का अनुभव परिवार को टूटने से बचा सकता है। उनकी सीख और आशीर्वाद परिवार में स्थिरता लाते हैं।विवाह केवल अधिकार नहीं, बल्कि कर्तव्य और समर्पण का बंधन है। दोनों को एक-दूसरे के सुख- दुख में सहभागी बनना चाहिए। सनातन संस्कृति में विवाह को सात जन्मों का पवित्र बंधन माना गया है। यदि दंपति धैर्य, मर्यादा, प्रेम और विश्वास बनाए रखें, तो परिवार और समाज दोनों मजबूत बनते हैं।
पति-पत्नी का संबंध केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि पूरे समाज की नींव है। जब परिवारों में प्रेम, सम्मान और संस्कार होंगे, तभी समाज में शांति और नैतिकता बनी रहेगी। इसलिए आधुनिकता के साथ-साथ भारतीय संस्कृति, धैर्य और पारिवारिक मूल्यों को अपनाना ही सामाजिक पतन से बचने का सर्वोत्तम उपाय है। समाज में बदलते चलन और बहस कि “स्त्री कमाए या पुरुष खाना बनाए” अब इतनी तेज़ होता जा रहा है। एक तरफ पुरुषों को लगता है कि वे ही सब कुछ ढो रहे हैं, दूसरी तरफ स्त्रियों को लगता है कि उनके श्रम को अदृश्य मान लिया गया है। सच यह है कि दोनों ही अपने- अपने मोर्चे पर खड़े हैं। बस एक घर के बाहर लड़ रहा है और दूसरा घर के भीतर, चुपचाप। ज़रा सोचिए, अगर एक दिन भूमिकाएँ सचमुच बदल जाएँ,स्त्रियाँ पूरी तरह बाहर की ज़िम्मेदारियाँ संभालें और पुरुष घर के हर छोटे बड़े काम को सँभालें, तो शायद यह बहस खुद ही ख़त्म हो जाए। आज की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि हम एक-दूसरे को समझने के बजाय एक-दूसरे को साबित करने में लगे हैं कि कौन ज़्यादा संघर्ष करता है। जबकि सच्चाई यह है कि संघर्ष का कोई एक पैमाना नहीं होता जिससे मापा जा सके कि किसका संघर्ष ज़्यादा है। वह कभी ऑफिस की थकान में होता है, तो कभी रसोई की भाप में घुला होता है।
ज़रूरत इस बात की नहीं कि हम जीतें, बल्कि इस बात की है कि हम दोनों तरफ से देखें। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि -ए वर्ड केन नॉट फ्लाई विद ए सिंगल विंग। कहने का मतलब है कि पति पत्नी एक दूसरे के पूरक हैं। हो सकता है एक को दूसरे से ज्यादा काम करना पड़ता हो लेकिन आपसी समझ और तालमेल से ही जीवन सुखमय बन सकता है। आधुनिक वातावरण में सामाजिक व्यवस्था और हमारी सांस्कृतिक परंपराएं जो एक मजबूत ढांचे की तरह थी, कहीं न कहीं ढहती जा रही हैं। इसके पीछे कहीं न कहीं इगो और पश्चिमी सभ्यता और आपसी टकराव अहम कारण बनतें जा रहे है, इसे हमें समझना होगा।
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