
लेखक:भगवान दास शर्मा प्रशांत
विवाह का बदलता स्वरूप : वैदिक कर्मकाण्डों की कमी और भोजन की बर्बादी — एक चिंतनीय विषय
भारतीय संस्कृति में विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि दो परिवारों, संस्कारों और परम्पराओं का पवित्र बंधन माना गया है। सनातन परंपरा में विवाह को सोलह संस्कारों में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। प्राचीन काल में विवाह समारोह सादगी, मर्यादा, वैदिक मंत्रों और धार्मिक विधानों के साथ सम्पन्न होते थे। किंतु वर्तमान समय में विवाह का स्वरूप तेजी से बदलता जा रहा है। आधुनिकता और दिखावे की होड़ ने विवाह को संस्कार से अधिक प्रदर्शन का माध्यम बना दिया है। विशेष रूप से वैदिक कर्मकाण्डों की उपेक्षा तथा भोजन की अत्यधिक बर्बादी आज गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है।
पहले विवाह में यज्ञ, सप्तपदी, कन्यादान, वर-वधू को धर्म और कर्तव्य का उपदेश जैसे वैदिक कर्मकाण्डों का विशेष महत्व होता था। विवाह का प्रत्येक मंत्र जीवन के आदर्शों, आपसी विश्वास और गृहस्थ धर्म की शिक्षा देता था। परिवारजन पूरे श्रद्धा भाव से इन विधियों में सम्मिलित होते थे। किंतु आज अधिकांश लोगों का ध्यान केवल सजावट, डीजे, महंगे वस्त्र और फोटोशूट पर अधिक केंद्रित हो गया है। विवाह मंडप में मंत्रों की ध्वनि कम और तेज संगीत का शोर अधिक सुनाई देता है। अनेक लोग कर्मकाण्डों को समय की बर्बादी समझने लगे हैं, जबकि यही विधियाँ विवाह को संस्कार बनाती हैं।
इसके साथ ही विवाह समारोहों में भोजन की बर्बादी भी अत्यंत दुःखद स्थिति है। आजकल विवाह में सैकड़ों प्रकार के व्यंजन केवल दिखावे के लिए बनाए जाते हैं। अतिथि आवश्यकता से अधिक भोजन अपनी प्लेटों में ले लेते हैं और उसका बड़ा भाग बिना खाए ही फेंक दिया जाता है। एक ओर देश में अनेक लोग भूखे सोते हैं, वहीं दूसरी ओर टनों भोजन कूड़ेदान में चला जाता है। यह केवल आर्थिक हानि ही नहीं, बल्कि नैतिक संवेदनहीनता का भी प्रतीक है।
विवाहों में बढ़ता आडंबर समाज में आर्थिक असमानता और मानसिक दबाव भी उत्पन्न करता है। मध्यमवर्गीय परिवार दूसरों की नकल में अत्यधिक खर्च करने को विवश हो जाते हैं। कई परिवार विवाह के कारण कर्ज तक ले लेते हैं। इससे विवाह जैसे पवित्र संस्कार का वास्तविक उद्देश्य पीछे छूट जाता है।
समय की आवश्यकता है कि हम विवाह को पुनः संस्कार और सांस्कृतिक मर्यादा से जोड़ें। वैदिक कर्मकाण्डों का महत्व समझते हुए विवाह को सरल, संयमित और अर्थपूर्ण बनाया जाए। भोजन की बर्बादी रोकने के लिए सीमित और आवश्यक व्यवस्था की जाए। बचा हुआ भोजन जरूरतमंदों तक पहुँचाने की व्यवस्था भी की जा सकती है। समाज को यह समझना होगा कि विवाह की भव्यता खर्च और दिखावे में नहीं, बल्कि प्रेम, संस्कार और आत्मीयता में होती है।
अंततः कहा जा सकता है कि विवाह का बदलता स्वरूप सचमुच चिंता का विषय है। यदि समय रहते हमने अपनी परम्पराओं, संस्कारों और सामाजिक जिम्मेदारियों को नहीं समझा, तो विवाह केवल एक औपचारिक आयोजन बनकर रह जाएगा। आवश्यकता इस बात की है कि हम आधुनिकता के साथ अपनी संस्कृति और मानवीय मूल्यों का संतुलन बनाए रखें।
