
रितेश सैन सामाजिक कार्यकर्ता
हरि न्यूज
नजीबाबाद ।”ऊपर की कमाई” — यह वह शब्द है जिसने भारतीय प्रशासनिक और सामाजिक व्यवस्था की जड़ों को खोखला कर दिया है। तकनीक बदली, सरकारें बदलीं, और सख्त कानूनों का शोर भी मचा, लेकिन रिश्वतखोरी का अंतहीन सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा।
आखिर ऐसा क्या है जो भ्रष्टाचार के इस दानव को जीवित रखता है?
आज भी कई सरकारी काम इतने पेचीदा हैं कि एक आम आदमी फाइलों के जाल में फंसकर रह जाता है। जब सीधे रास्ते से काम होने में हफ़्तों या महीनों लग जाते हैं, तो लोग ‘शॉर्टकट’ के तौर पर रिश्वत का सहारा लेते हैं। बिचौलिये इसी मजबूरी का फायदा उठाते हैं।
भ्रष्टाचार के खिलाफ कानून तो हैं, लेकिन अदालती मामलों का सालों तक खिंचना और साक्ष्यों के अभाव में भ्रष्ट अधिकारियों का केवल सस्पेंड होना या स्थानांतरण होकर बच निकलना, इससे भ्रष्ट अधिकारियों के हौसले बुलंद होते हैं और अधिकारियों के मन से कानून का खौफ खत्म कर देता है।
शायद सबसे दुखद पहलू यह है कि समाज ने रिश्वतखोरी को एक ‘जरूरी बुराई’ के रूप में स्वीकार कर लिया है। अब लोग इसे अपराध नहीं, बल्कि काम कराने की ‘फीस’ समझने लगे हैं। जब तक सामाजिक तौर पर भ्रष्ट व्यक्तियों का बहिष्कार नहीं होगा, यह प्रथा फलती-फूलती रहेगी।
संसाधनों की कमी और बढ़ती आबादी के कारण प्रतिस्पर्धा चरम पर है। चाहे वह टेंडर हासिल करना हो, अच्छी नौकरी पाना हो, या जमीन का रजिस्ट्रेशन, ‘पहले’ और ‘बेहतर’ पाने की होड़ में लोग खुद ही बोली लगाने को तैयार हो जाते हैं।
समाधान की दिशा में क्या है विकल्प?
हमारा मानना है कि केवल कानून से बात नहीं बनेगी। इसके लिए तीन मोर्चों पर काम करना होगा:
पूर्ण डिजिटलीकरण: जितना कम मानव हस्तक्षेप होगा, रिश्वत की गुंजाइश उतनी ही कम होगी।
जो लोग भ्रष्टाचार की शिकायत करते हैं, उनकी सुरक्षा और गोपनीयता सुनिश्चित करना।
व्यवस्था में आने से पहले ही प्रशासनिक अधिकारियों की नैतिक नींव को मजबूत करना।
रिश्वतखोरी केवल लेने वाले की गलती नहीं है, बल्कि उस सिस्टम की उपज है जहां ईमानदारी महंगी और भ्रष्टाचार सुविधाजनक बना दिया गया है। जब तक “काम करने की गति” के लिए पैसे देने की मजबूरी खत्म नहीं होगी, यह सिलसिला जारी रहेगा।
