
डॉ पल्लवी सिंह ‘अनुमेहा’
लेखिका एवं कवयित्री
बैतूल, मध्यप्रदेश
खुद ही खुद की हमराह मैं,
खुद ही खुद से बेपरवाह मैं,
अपने ही अंतर्मन की पगडंडियों पर,
निश्छल चलती एक अनजान राह मैं।
न कोई छाया संग ठहरी,
न कोई स्वर ही साथ रहा,
स्वयं की नीरवता में डूबी,
एक अनकही-सी हर आह मैं।
आइनों से संवाद किया तो,
प्रतिबिंब भी मौन हो गए,
जो कहना चाहा अधरों ने,
वो शब्द कहीं लुप्त हो गए,
शायद इसलिए हर उत्तर से परे,
एक अनसुलझी-सी परिभाषा मै।
वक्त के झंझावतों में बहकर,
कितनी ही बार टूटी हूँ,
पर हर विखंडन के पश्चात,
फिर स्वयं से ही छूटी हूँ,
जैसे राख से उठती चिंगारी,
वैसी ही एक परिभाषा मैं।
भीड़ भरे इस जग में रहकर भी,
तन्हाई का आवरण ओढ़े,
अपने ही अंत:सागर में डूबी,
अनगिन ज्वारों को जोड़े,
बाह्य जगत से दूर कहीं,
अंतस की गहनतम भाषा मैं।
ना कोई शिकवा, ना अपेक्षा,
ना कोई संबल, ना आसरा,
स्वयं के साहस की परीधि में,
गूँजता अपना ही वासरा,
अधूरेपन की पूर्ण कथा,
स्वयं में ही एक उपन्यास मैं।
खुद ही खुद की हमराह मैं,
खुद ही खुद से बेपरवाह मै,
इस अंनत यात्रा के पथ पर,
स्वयं ही प्रश्न, स्वयं ही उत्तर,
स्वयं ही एक तलाश मैं।।
