
“प्रकृति बोलती नहीं, फिर भी बहुत कुछ कह जाती है।
वह शिकायत नहीं करती, फिर भी अपने घाव दिखा जाती है।”
लेखिका जूही अग्रहरी
हर वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। यह केवल एक दिवस नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारियों का स्मरण है। पर्यावरण हमारे जीवन का आधार है। स्वच्छ वायु, निर्मल जल, हरे-भरे वृक्ष और संतुलित जलवायु के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। फिर भी आज मानव अपनी सुविधाओं और विकास की दौड़ में प्रकृति को सबसे अधिक नुकसान पहुँचा रहा है।
कभी कल-कल बहने वाली नदियाँ प्रदूषण से जूझ रही हैं। कभी घने जंगलों से आच्छादित धरती का बड़ा हिस्सा आज कंक्रीट के जंगलों में बदलता जा रहा है। बढ़ता प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन आने वाले समय के लिए गंभीर खतरा बन चुका है। प्रकृति हमें बार-बार चेतावनी दे रही है, लेकिन हम उसकी आवाज़ सुनने के बजाय उसे अनदेखा कर रहे हैं।
वृक्ष केवल लकड़ी नहीं हैं, वे जीवन हैं। नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं, बल्कि सभ्यताओं की जननी हैं। पहाड़ केवल पत्थरों का ढेर नहीं, बल्कि प्रकृति की धड़कन हैं। जब हम इन्हें नुकसान पहुँचाते हैं, तो वास्तव में हम अपने ही भविष्य को कमजोर कर रहे होते हैं।
विश्व पर्यावरण दिवस हमें यह संदेश देता है कि यदि हमें आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित और सुंदर पृथ्वी देनी है, तो आज ही जागरूक होना होगा। एक पौधा लगाना, जल की बचत करना, प्लास्टिक का कम उपयोग करना और प्रकृति के प्रति संवेदनशील होना छोटे कदम अवश्य हैं, लेकिन यही छोटे कदम बड़े बदलाव का आधार बनते हैं।
धरती हमारी आवश्यकता पूरी करती है, लेकिन हमारे लालच को नहीं। इसलिए समय की मांग है कि हम प्रकृति के साथ संघर्ष नहीं, बल्कि सहयोग का संबंध स्थापित करें। क्योंकि जब प्रकृति मुस्कुराएगी, तभी मानवता सुरक्षित रह पाएगी।
कविता : “धरती की पुकार”
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मत काटो इन वृक्षों को, ये जीवन का आधार हैं,
इनकी छाँव में बसते कितने सपने और संसार हैं।
नदियाँ रोती हैं चुपके से, पर्वत भी लाचार हैं,
मानव के स्वार्थ के आगे आज सभी बेकार हैं।
आओ मिलकर प्रण करें, प्रकृति का सम्मान करें,
हरियाली के इस आँचल को फिर से हम गुलज़ार करें।
धरती माँ की यही पुकार, सुन लो अब ऐ इंसान,
पर्यावरण को बचा सको तो होगा जीवन महान।
