
लेखक:डॉ. ओंकार त्रिपाठी /दिल्ली
उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव रोकने के उद्देश्य से यूजीसी द्वारा लागू किए गए नए नियम पहली नज़र में न्यायप्रिय और संवेदनशील लगते हैं,लेकिन गहराई से देखने पर ये कई ऐसे प्रश्न खड़े करते हैं, जिनका उत्तर नियमों में कहीं नहीं मिलता। सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या इन नियमों का दुरुपयोग नहीं हो सकता? और यदि हो सकता है,तो उसकी जवाबदेही किसकी होगी?
किसी भी कानून या नियम की आत्मा केवल मंशा से नहीं,बल्कि उसकी प्रक्रिया और संतुलन से तय होती है। नए नियमों में भेदभाव की शिकायत का अधिकार तो बढ़ाया गया है, लेकिन यह तय करने की कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है कि शिकायत सच्ची है या झूठी,और यदि झूठी है तो उसका दंड क्या होगा। 2012 के पुराने नियमों में झूठी शिकायत पर दंड का प्रावधान था,जिसे 2026 के नियमों से हटा दिया गया। इसका जवाब तो हटाने वाला ही दे सकता है। लेकिन यूजीसी के यह नया नियम गंभीर चिंता का विषय है।
कानून का डर केवल अपराधी को होना चाहिए,निर्दोष को नहीं। लेकिन जब शिकायत करने वाले पर कोई उत्तरदायित्व ही न हो, तो यह नियम न्याय का औज़ार कम और दुरुप्रयोग का हथियार अधिक बन जाता है। प्रश्न यह नहीं है कि भेदभाव होता है या नहीं—प्रश्न यह है कि क्या हर शिकायत स्वतः सत्य मान ली जाएगी? और यदि ऐसा है, तो यह न्याय नहीं, पूर्वाग्रह है।
आज का भारतीय समाज,विशेषकर नई पीढ़ी तेज़ी से जाति और पंथ के भेदभाव से ऊपर उठ रही है। एससी,एसटी,ओबीसी और सवर्ण वर्गों के बच्चे साथ पढ़ते हैं, साथ खाते हैं, साथ उठते-बैठते हैं,एक-दूसरे के मित्र हैं और अब तो विवाह-संबंध भी बन रहे हैं। ऐसे समय में यदि कोई नियम यह संकेत दे कि समाज अब भी केवल अत्याचारी बनाम पीड़ित के खांचे में ही देखा जाएगा, तो यह समाज को जोड़ने के बजाय फिर से बाँटने का काम करेगा।
इस पूरे विमर्श में एक खतरनाक धारणा लगातार उभर रही है कि सवर्ण वर्ग जन्मजात अत्याचारी, अनाचारी है और एससी-एसटी-ओबीसी वर्ग स्वभावतः निर्दोष, सज्जन और हरिश्चंद्र के समान सत्यवादी। क्या यही संवैधानिक समानता है?
संविधान व्यक्ति को उसके कृत्य से आंकता है, उसकी जाति से नहीं।अपराधी अपराध से बनता है,जन्म से नहीं।
ऐसे में नियम यदि एकतरफ़ा होंते हैं तो आपसी विश्वास टूटता है। यदि सवर्ण व्यक्ति दोषी है, तो उसे अवश्य दंड मिलना चाहिए, कठोरतम दंड मिलना चाहिए। लेकिन यदि कोई शिकायत झूठी सिद्ध होती है, तो क्या झूठी शिकायत करने वाले को केवल “छूट” मिलनी चाहिए? नहीं। ऐसे मामलों में कठोर दंड का स्पष्ट प्रावधान भी होना चाहिए।
यदि छात्र झूठी शिकायत करता है, तो उसका संस्थान से निष्कासन हो, उसकी शिक्षा वहीं समाप्त मानी जाए और भविष्य में कहीं प्रवेश तक न मिले। यदि कोई शिक्षक झूठी शिकायत करता है, तो उसे सेवा से हटाया जाए और भविष्य में किसी शैक्षणिक संस्था में नियुक्ति न मिले। साथ ही आर्थिक दंड और मानहानि की भरपाई का भी प्रावधान हो। यही वास्तविक समानता है।
कानून और नियम समाज को न्याय दिलाने के लिए होते हैं, दुरुपयोग के लिए नहीं। जो व्यक्ति कानून का दुरुपयोग करता है, वह शातिर होता है और ऐसे शातिर व्यक्ति के साथ वही व्यवहार होना चाहिए जिसे हमारे शास्त्र कहते हैं-‘शठे शाठ्यं समाचरेत्।’
संतुलित, निष्पक्ष और जवाबदेह नियम ही स्वस्थ समाज की नींव रखते हैं, अन्यथा समता के नाम पर बना नियम स्वयं असमानता का प्रतीक बन जाता है और यह किसी भी वर्ग के साथ न्याय नहीं होता।
