
कविता
मकर संक्रांति
आओ मिलजुल कर हम सब बच्चे,
मकर संक्रांति का पावन पर्व मनाये।
सुबह उठकर झटपट हम सब,
गंगा-जमुना-नर्मदा जी में डुबकी लगकर,
जन्म-जन्मों का पावन-पुण्य कमाएं।
करें परिधान झटपट ऊनी धारण,
आलाब अलाब निकट बैठ अपनी ठंड भगायें।
फिर दादी, अम्मां, भाभी, बहिना के हाथों बनी मुरमुरे, फुली, तिल, गुड़ के मीठे लड्डू गपागप खायें।
मुट्ठी भर-भर पास पड़ोस में गरीबों के साथ मिल बांटकर खायें।
घर से बाहर निकलकर खेलें गिल्ली डंडा आकाश में रंग-बिरंगी पतंगें उड़ा कर पेंच लड़ायें।
कभी न चीनी माझा खरीदे यह है जान को खतरा,
रखना सदा इस बात का ध्यान।
आज ही सूरज दादा ने मकर रेखा पर कदम बढ़ायें, धीरे-धीरे हर माह दादा अपनी उमस बढायें।
मांग लो वरदान देव से हो सबका विकास,
भर लो जीवन की हर खुशी मिलजुलकर अपने पाश।
क्या पता कल मिले न मिले खुशी के पल ये,
आओ खेलें गिल्ली डंडा
रंग- बिरंगी पतंगों के उडालो आज गुलाल।
( अब्दुल सलाम कुरैशी)
जिला- गुना (म.प्र)
