
भगवानदास शर्मा “प्रशांत”
शिक्षक सह साहित्यकार
इटावा उत्तर प्रदेश
श्रीमद्भगवद्गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन का गहन विज्ञान है। महाभारत के युद्धक्षेत्र में श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेश आज भी मानवता को दिशा दिखाते हैं। गीता कर्म, ज्ञान, भक्ति और आत्म अनुशासन का अद्भुत समन्वय है, जो हर युग में मार्गदर्शक रही है।
गीता का मूल संदेश है— *“कर्मण्येवाधिकारस्ते”*
अर्थात हमें केवल अपने कर्म पर ध्यान देना चाहिए, फल की चिंता नहीं करनी चाहिए। यह सिद्धांत जीवन में एकाग्रता, परिश्रम और जिम्मेदारी का भाव जगाता है। गीता मन को स्थिर और शांत रखने की कला सिखाती है। *“योगः कर्मसु कौशलम्”* और *“समत्वं योग उच्यते”* जैसी शिक्षाएँ हमें क्रोध, भय, मोह और तनाव से मुक्त होकर निर्णय लेना सिखाती हैं। गीता में मानव जीवन का एक लक्ष्य बताया गया है—धर्म का पालन, आत्म- विकास और समाज हित। इस दिशा में चलने वाला व्यक्ति भ्रम, निराशा और संदेह के अंधकार में नहीं भटकता। गीता के उपदेश सत्य, अहिंसा, संयम, विनय, क्षमा, करुणा जैसे गुणों का विकास करते हैं। ऐसे गुण व्यक्ति को आदर्श जीवन जीने में सक्षम बनाते हैं। आज की तेज रफ्तार ज़िंदगी में तनाव, अवसाद और चिंता आम हैं। गीता “चित्त की एकाग्रता” और “स्थित प्रज्ञता” का मार्ग दिखाती है, जिससे मानसिक शांति प्राप्त होती है।
प्रतिस्पर्धा और जटिल परिस्थितियों में सही निर्णय लेना कठिन हो जाता है। गीता धैर्य, विवेक और समत्व की भावना से निर्णय लेना सिखाती है, जो आधुनिक जीवन में अत्यंत आवश्यक है।
छात्र, शिक्षक, अधिकारी, नेता या गृहस्थ—हर व्यक्ति के लिए गीता कहती है कि अपने कर्तव्य को निष्ठा और निष्काम भाव से करना ही श्रेष्ठ है। यह सिद्धांत आज के कार्य-क्षेत्र में भी सफलता की कुंजी है।
आज समाज में मूल्य, नैतिकता और अनुशासन का ह्रास दिखता है। गीता हमें धर्म अर्थात सही आचरण का बोध कराकर जीवन को सार्थकता प्रदान करती है। गीता जयंती के पावन अवसर पर सभी श्रद्धालु जनों एवं सनातनियों को हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं।
आइए, हम सब मिलकर गीता के संदेश *’कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’* को जीवन में उतारें।
🕉️जय श्रीकृष्ण!🕉️
