सत्य है सद्गुरु स्वर्ग दीप है,जो स्वयं रहता अंधियारे में

Uncategorized

लेखक:अब्दुल सलाम कुरैशी

हरि न्यूज

मानव जाति के प्रथम गुरु,
बने हैं हमारे महर्षि वेदव्यास।
मानव जाति नमन करती,
आज उनको कोटि-कोटि बार।
सृष्टि का प्रथम सद्गुरु ,
आचार्य ,शिक्षक,माँ -जननी हैं।
कैसे कलम पकड़ना, लिखना,
बोलना, पढ़ना सीखते सद्गुरु हैं।
जीवन ना बन जाए कहीं,
हैवान- शैतान बच्चों का।
छान छान कर भरते सद्गुण,
ईश्वर तुल्य सद्गगुरु को प्रणाम।
सद्गुरु ने खींची रेखा पट्टी पर,
मेरा भाग्य चमकाया है।
धन्य हैं सद्गुरु जी ‘अ’ से अनपढ़ पढ़ाकर,
मुझे ‘ज्ञ’ से ज्ञानी बनाया है।
गुरु माता-पिता गुरु जगतदाता,
गुरु बिना जग में चहुँ ओर अंधियारा है।
जो बच्चे नित्य पठन- पाठ करते हैं,
वे शीघ्र कुशाग्र बुद्धिमान हो जाते हैं।
गुरु की महिमा का नित्य करें बखान,
गुरु ही हमारा सच्चा भाग्य विधाता है।
गुरु से सीखा और जाना है
हमने,
कलम का अर्थ क्या होता है।
हम बच्चे गीली मिट्टी के ढेले,
गुरु ने दिया हमें भीतर बाहर आकार।
हमारी जीवन- बगिया का वह,
बड़ा ही होनहार कुंभकार।
राम-कृष्ण को मूर्त्त रूप दिया,
वह है बड़ा महान चित्रकार।
गुरु हमारे संकट सागर में,
हमारी नैय्या खेता है।
गुरु का बनना सरल नहीं है,
गुरु से बड़ा कोई महान नहीं है।
सत्य है सद्गुरु स्वर्ण दीप है,
जो रहता स्वयं अँधियारे में।
अपने स्नेह से तिल-तिल जलता,
बच्चों का भाग्य चमकाता है।
मेरे सद्गुरु मेरे भाग्य विधाता,
गुरु,माता,पिता है जगतदाता।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *