
हरि न्यूज
हरिद्वार।उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय, विदेश मंत्रालय (भारत सरकार) एवं केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संस्कृत सम्मेलन का समापन समारोह संस्कृत अकादमी के प्रेक्षागृह में आयोजित किया गया।

कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों द्वारा दीप प्रज्जवलन के साथ किया गया। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर दिनेश शास्त्री द्वारा मंचासीन अतिथियों तथा सभी प्रतिभागियों का स्वागत किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि वर्तमान समय में वैज्ञानिक, सामाजिक, सांस्कृतिक नैतिक एवं आध्यात्मिक उत्थान में भारतीय ज्ञान परम्परा व प्राचीन देवभाषा संस्कृत का विशेष योगदान सर्वविदित है। उन्होंने बताया कि हमारे राज्य की द्वितीय राजभाषा भी देववाणी संस्कृत भाषा ही है। संस्कृत साहित्य में वर्णित जीवन मूल्य व सांस्कृतिक विरासत आज अंतरराष्ट्रीय एकता व समत्व के लिए सेतु रुप में विद्यमान है। ज्ञान, प्रज्ञा और सत्य की खोज को भारतीय ज्ञान परम्परा और दर्शन में सदा सर्वोच्च मानवीय लक्ष्य माना गया है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि संस्कृत भाषा तथा भारतीय ज्ञान परम्परा का आज वैश्विक स्तर पर चिंतन एवं मंथन हो रहा है। इसका प्रमाण यह अंतरराष्ट्रीय संस्कृत सम्मेलन है।
कार्यक्रम के अति विशिष्ट अतिथि एवं राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने कहा कि उत्तराखंड देश का पहला ऐसा राज्य है जिसने संस्कृत को द्वितीय राजभाषा घोषित किया है। उन्होंने बताया कि देवभूमि उत्तराखंड प्राचीन काल से ही भारतीय ज्ञान परंपरा का एक ऊर्जामय एवं महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। संस्कृत के महत्व पर चर्चा करते हुए श्री निशंक ने कहा कि संस्कृत मात्र एक भाषा नहीं अपितु यह भारत की आत्मा है। उन्होंने कार्यक्रम में उपस्थित सभी संस्कृत प्रेमियों से पूरी निष्ठा एवं लगन से संस्कृत के प्रचार प्रसार की अपील की।
कार्यक्रम के अध्यक्ष एवं क्षेत्रीय विधायक आदेश चौहान ने आयोजन की खुले मन से प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली पर केंद्रित इस प्रकार के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन संस्कृत प्रेमियों एवं शोधार्थियों को इस विषय को और अधिक गहराई से समझने के लिए प्रेरित तथा मार्गदर्शित करते हैं। उन्होंने आशा जाहिर की कि प्रतिभागी इस समागम से निकले अमृत रूपी ज्ञान को अपने-अपने क्षेत्र में फैलाकर भारतीय ज्ञान परंपरा को जन जन तक पहुंचाने का नेक कार्य करेंगे।
कार्यक्रम की विशिष्ट अतिथि एवं विदेश मंत्रालय की सचिव डॉ. नीना मल्होत्रा ने कहा कि संस्कृत प्रेमियों का यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन संस्कृत के प्रचार प्रसार के लिए एक ठोस कदम साबित होगा। उन्होंने बताया कि इस सम्मेलन में उपस्थित विद्वानों की चर्चा के उपरांत जो शोध निष्कर्ष सामने आएं हैं, वे विश्व स्तर पर भारतीय ज्ञान प्रणाली को पुनर्स्थापित करने में सहायक सिद्ध होंगे। उन्होंने कहा कि देश का विदेश मंत्रालय भारतीय ज्ञान प्रणाली को वैश्विक स्तर पर प्रचारित एवं प्रसारित करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने बताया कि भारतीय ज्ञान प्रणाली का प्रचार प्रसार वर्तमान समय की आवश्यकता है, जिसमें देशवासियों को बढ़-चढ़कर प्रतिभाग करना चाहिए।
कार्यक्रम के सारस्वत अतिथि एवं सचिव संस्कृत शिक्षा दीपक कुमार गैरोला ने कहा कि इस अंतरराष्ट्रीय संस्कृत सम्मेलन का विषय अत्यंत सार्थक है। यह विषय आज के ज्ञान आधारित वैश्विक परिवेश में अत्यंत प्रासंगिक भी है। उन्होंने बताया कि संस्कृत मात्र एक भाषा नहीं अपितु यह भारत की सांस्कृतिक स्मृति, वैज्ञानिक चेतना और आध्यात्मिक दर्शन का आधार है। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में विश्व के 11 देशों के विद्वानों की उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि संस्कृत का प्रभाव वैश्विक है। संस्कृत भाषा ने सदैव मानवता को जोड़ने का काम किया है, इसमें निहित वसुधैव कुटम्बकम् का भाव आज पूरे विश्व के लिए बंधुत्व की एक मिसाल है।
धन्यवाद ज्ञापन विश्वविद्यालय के कुलसचिव दिनेश कुमार राणा द्वारा किया गया। कार्यक्रम में देश-विदेश के अनेक संस्कृत प्रेमी, प्रतिभागी एवं देश एवं प्रदेश के गणमान्य सदस्यों सहित विभिन्न शिक्षण संस्थानों के शिक्षक, विद्यार्थी एवं शोधार्थी उपस्थित रहे।
