
हरि न्यूज
हरिद्वार। संस्कृतसप्ताह कार्यक्रम के समापनावसर पर आज श्री भगवानदास आदर्श संस्कृत महाविद्यालय, हरिद्वार एवं संस्कृतभारती, उत्तराञ्चल के संयुक्त तत्त्वावधान में एक विशाल संस्कृत शोभायात्रा का भव्य एवं गरिमामय आयोजन किया गया। इस शोभायात्रा को संस्कृत भाषा के पुनरुत्थान और उन्नति का एक ऐतिहासिक ‘शङ्खनाद’ माना जा रहा है। शोभायात्रा के मुख्य संरक्षक प्रो. यशवीर सिंह के कुशल मार्गदर्शन तथा कार्यक्रम आयोजक डॉ. रवीन्द्र कुमार एवं गौरव शास्त्री (प्रान्त सङ्गठन मन्त्री, संस्कृतभारती, उत्तराञ्चल) के संयोजन में यह आयोजन अत्यन्त सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ।

आयोजक डॉ. रवीन्द्र कुमार ने अपने वक्तव्य में कहा, संस्कृत को केवल कर्मकाण्ड, मठों या प्राचीन पोथियों की चौखट तक सीमित समझने की भूल कदापि न करें। यह कोई अतीत का मृत अवशेष नहीं, बल्कि आधुनिक विज्ञान, अंतरिक्ष, कंप्यूटर और अत्याधुनिक तकनीकी युग की सबसे अजेय, प्रामाणिक और वैज्ञानिक भाषा है, जिसके तार्किक सामर्थ्य का लोहा आज पूरा विश्व मान रहा है। आज हरिद्वार की पावन धरा पर निकाली गई यह विशाल शोभायात्रा केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक प्रचण्ड शङ्खनाद है। यह भारतीय अस्मिता का वह सिंहनाद है; जिसका उद्देश्य जन-जन की सोई हुई चेतना को झकझोर कर जगाना और दसों दिशाओं में संस्कृत के अजेय गौरव का जयघोष करना है। हम चाहते हैं कि आज की युवा पीढ़ी अपनी रगों में दौड़ते इस सांस्कृतिक और भाषायी गौरव को पहचाने। वे उठें, अपनी महान जड़ों से जुड़ें और विश्व पटल पर भारत और संस्कृत का परचम पुनः पूरे स्वाभिमान एवं शौर्य के साथ लहराएं।
संस्कृतभारती, उत्तराञ्चल के प्रान्त सङ्गठन मन्त्री गौरव शास्त्री ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा, संस्कृत केवल एक कालखंड विशेष की भाषा नहीं है, बल्कि यह भारतवर्ष की आत्मा और हमारी सांस्कृतिक पहचान है। संस्कृतभारती का निरंतर प्रयास है कि ‘संस्कृतं गृहे गृहे, वदतु संस्कृतं जने जने’ के संकल्प को साकार किया जाए। आज की यह शोभायात्रा समाज में संस्कृत संभाषण के प्रति सकारात्मक चेतना जगाने और संस्कृत को दैनिक जीवन की व्यावहारिक भाषा बनाने की दिशा में एक सशक्त कदम है। गौरव शास्त्री ने अपने विचार व्यक्त करते हुए उत्तराखण्ड सरकार से संस्कृत के प्रति ठोस कदम उठाने की भी अपील की। उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड में संस्कृत को द्वितीय राजभाषा का दर्जा प्राप्त होने के बावजूद, इसके क्रियान्वयन और संवर्द्धन के प्रति सरकार का रवैया चिंताजनक रूप से संवेदनहीन सा प्रतीत होता है। यदि सरकार रवैया ऐसे ही संवेदनहीन बना रहा तो संस्कृतजगत् संस्कृतभाषा के लिये एक व्यापक आन्दोलन हेतु सदैव तत्पर है। सरकार से हमारी मांग है कि जिस प्रकार तीर्थनगरी हरिद्वार में पतितपाविनी माँ भागीरथी के तट पर महाकुम्भ का आयोजन होता है, ठीक उसी भव्यता और निष्ठा के साथ संस्कृत भाषा के संरक्षण, संवर्द्धन एवं प्रसार के लिए भी राजकीय स्तर पर विशेष आयोजनों की रूपरेखा तैयार की जानी चाहिए। संस्कृत भारतवर्ष की आत्मा और हमारी सांस्कृतिक पहचान है, जिसे जन-जन तक पहुँचाना अनिवार्य है।
इस भव्य आयोजन को सुचारु एवं व्यवस्थित रूप से संचालित करने में डॉ. आशिमा श्रवण जी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनके द्वारा कार्यक्रम के कुशल मंच संचालन, प्रचार-प्रसार तथा व्यवस्थात्मक कार्यों का दायित्व निष्ठापूर्वक निभाया गया, जिसकी सभी अतिथियों एवं उपस्थित जनसमूह द्वारा भूरि-भूरि प्रशंसा की गई।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में उत्तराखंड के पूर्व कैबिनेट मन्त्री मदन कौशिक ने दीप प्रज्वलित कर शोभायात्रा का शुभारम्भ किया। उन्होंने कहा कि संस्कृत भाषा के सांस्कृतिक एवं ज्ञानवर्धक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संस्कृत हमारी सभ्यता और ज्ञान-विज्ञान की धरोहर है।
शोभायात्रा जैसे ही नगर के प्रमुख मार्गों से गुजरी, संपूर्ण वातावरण देववाणी के नारों और पुष्पों की सुंगध से महक उठा। इस अवसर पर देववाणी संस्कृत के प्रति अगाध श्रद्धा और अभूतपूर्व उत्साह का परिचय देते हुए प्रमुख समाजसेवी डॉ. विपिन प्रेमी, डॉ. विमुग्धा प्रेमी (रत्नभारती डायग्नोस्टिक) एवं डा.विशाल गर्ग (विशाल ऑप्टिकल्स) सहित अनेक गणमान्य सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं प्रबुद्ध नगरवासियों द्वारा शोभायात्रा पर अनवरत पुष्पवर्षा की गई। उनके द्वारा संस्कृत-अनुरागियों का जिस आत्मीयता, गर्मजोशी और सम्मानजनक भाव से स्वागत किया गया, उसने शोभायात्रा की शोभा में चार चांद लगा दिए। नगरवासियों के इस अपार स्नेह और सम्मान ने शोभायात्रा में शामिल सभी आचार्यों, विद्यार्थियों और कार्यकर्ताओं के उत्साह को द्विगुणित कर दिया।
शोभायात्रा में जनपद हरिद्वार के विद्यालयों, महाविद्यालय, विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों, आचार्यों, संस्कृत अनुरागियों तथा अनेक गणमान्य सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। शोभायात्रा के दौरान संस्कृत के स्लोगन, वेद मंत्रों का सस्वर उच्चारण और उत्तराखण्ड राज्य का पारम्परिक व सांस्कृतिक वाद्य सङ्गीत आकर्षण का केंद्र बने रहें।
आयोजन समिति ने कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए सभी अतिथियों, प्रतिभागियों और सहयोगियों का आभार व्यक्त किया।
