
*अमेरिकन आश्रम में ‘चुरा’ नहीं मिला तो क्षेत्रीय नेताओं और समाजसेवियों ने फैलाया रायता, अब संपत्ति की सुरक्षा और प्रशासन की भूमिका पर उठे सवाल ?
हरि न्यूज
हरिद्वार। उत्तरी हरिद्वार के भूपतवाला क्षेत्र में स्थित प्रसिद्ध अमेरिकन आश्रम यानी देवानन्द भक्ति योग आश्रम की संपत्ति को लेकर विवाद गहराता जा रहा है।सूत्रों के अनुसार स्थानीय स्तर पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि ट्रस्ट की बेशकीमती संपत्ति पर कुछ प्रभावशाली संतों और कथित भू-माफिया तत्वों की नजर है और अलग-अलग तरीके से संपत्ति के स्वरूप को बदलने की कोशिश की जा रही है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संपत्ति से संबंधित वास्तविक स्थिति जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकती है।
सूत्रों के अनुसार स्थानीय लोगों का कहना है कि उक्त संपत्ति पर कभी पीठ निर्माण की चर्चाएं सामने आईं तो अब दुकान और कॉलोनी जैसे निर्माण की गतिविधियां दिखाई देने की बात कही जा रही है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर ट्रस्ट की संपत्ति का वर्तमान उपयोग किसकी अनुमति से हो रहा है? निर्माण के लिए संबंधित विभागों से अनुमति ली गई है या नहीं? और यदि अनुमति नहीं ली गई तो जिम्मेदार विभाग अब तक खामोश क्यों हैं?
उक्त संपत्ति पर किसने डलवाई थी अवैध खनन सामग्री किस पर लगा था जुर्माना?
पिछले महीने भूपतवाला के एक नाले की सफाई के दौरान निकाली गई खनन सामग्री को किसके कहने पर उक्त संपत्ति पर डाला गया था जिसमें खनन अधिकारी ने आकर खुद मौका मुआयना किया था और विवाद भी गरमा गया था जिला प्रशासन को उक्त रिपोर्ट को भी सार्वजनिक करना चाहिए था
संपत्ति मालिक विदेश में, वर्तमान में कौन करता है देखभाल
बताया जाता है कि संपत्ति से जुड़े स्वामित्व अधिकार रखने वाला पक्ष विदेश में रहता है। ऐसे में संपत्ति की देखरेख और उसके उपयोग को लेकर पारदर्शिता बेहद जरूरी हो जाती है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि मालिक विदेश में है तो प्रशासन और संबंधित विभागों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि संपत्ति पर होने वाली गतिविधियों की समय-समय पर जांच की जाए।
धार्मिक आयोजन के बाद और गरमाया मामला
सूत्रों के अनुसार, हाल ही में उक्त संपत्ति पर एक बड़ा धार्मिक आयोजन भी हुआ। स्थानीय स्तर पर दावा किया जा रहा है कि आयोजन के लिए संपत्ति स्वामी अथवा अधिकृत प्रबंधन से अनुमति नहीं ली गई थी। हालांकि इस दावे की भी आधिकारिक पुष्टि होना बाकी है। आयोजन की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित होने के बाद मामला और चर्चा में आ गया।
इसके बाद क्षेत्रीय नेताओं और कुछ समाजसेवियों ने भी संपत्ति के मुद्दे को जोर-शोर से उठाना शुरू कर दिया। लेकिन अब स्थानीय लोगों के बीच यह सवाल भी चर्चा का विषय है कि आखिर अचानक इस संपत्ति को लेकर इतनी सक्रियता क्यों बढ़ गई?
‘चुरा’ नहीं मिला तो मुद्दे को गर्माया विवाद ?
स्थानीय स्तर पर कटाक्ष किया जा रहा है कि जब कुछ नेताओं और तथाकथित समाजसेवियों को संपत्ति के मामले में अपेक्षित ‘चुरा’ नहीं मिला तो उन्होंने पूरे प्रकरण को ही गरमाने की कोशिश शुरू कर दी। हालांकि यह केवल स्थानीय चर्चाओं और आरोपों का हिस्सा है, जिसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
सवाल यह है कि यदि वास्तव में संपत्ति को लेकर गंभीर अनियमितताएं हैं तो इसकी शिकायत सीधे प्रशासन और संबंधित विभागों में क्यों नहीं की जाती? दस्तावेज सामने क्यों नहीं रखे जाते? और यदि आरोप गलत हैं तो उनके पीछे की मंशा को भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
संतों के बदलते पाले और संपत्ति विवाद
हरिद्वार की धार्मिक नगरी में संत समाज का अपना अलग प्रभाव है। ऐसे में किसी धार्मिक अथवा ट्रस्ट की संपत्ति से जुड़ा विवाद केवल जमीन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके सामाजिक और धार्मिक प्रभाव भी पड़ते हैं। स्थानीय लोगों में यह चर्चा भी है कि कुछ संत समय-समय पर अलग-अलग गुटों के साथ दिखाई देते हैं और संपत्ति से जुड़े विवादों में उनकी भूमिका पर सवाल उठते रहे हैं।
हालांकि किसी भी संत, नेता या व्यक्ति को भू-माफिया कहना अथवा उसके खिलाफ गंभीर आरोप लगाना जांच और ठोस प्रमाण के बिना उचित नहीं होगा। इसलिए पूरे मामले में निष्पक्ष जांच ही सच्चाई सामने लाने का सबसे मजबूत रास्ता है।
जिम्मेदार अधिकारी आखिर कब खोलेंगे फाइल?
अमेरिकन आश्रम की संपत्ति को लेकर सबसे बड़ा सवाल संबंधित विभागों की भूमिका पर खड़ा हो रहा है। यदि मौके पर निर्माण कार्य हुआ है तो क्या उसका नक्शा स्वीकृत है? भूमि का उपयोग किस उद्देश्य के लिए दर्ज है? क्या निर्माण के लिए अनुमति ली गई? क्या ट्रस्ट की संपत्ति को किसी अन्य उद्देश्य के लिए उपयोग करने की अनुमति है? इन तमाम सवालों का जवाब सरकारी रिकॉर्ड से आसानी से मिल सकता है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि प्रशासन को किसी पक्ष के दबाव में आने के बजाय राजस्व रिकॉर्ड, ट्रस्ट के दस्तावेज, भूमि उपयोग और निर्माण संबंधी स्वीकृतियों की जांच करनी चाहिए। यदि सब कुछ नियमानुसार है तो विवाद समाप्त हो जाएगा और यदि कहीं अनियमितता है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई का रास्ता साफ होगा।
अब देखना है—जेब गर्म होती है या संपत्ति बचती है
पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अमेरिकन आश्रम की बेशकीमती संपत्ति का भविष्य क्या होगा? क्या यह संपत्ति अपने मूल स्वरूप में सुरक्षित रह पाएगी या निर्माण और विवादों के बीच धीरे-धीरे इसका स्वरूप बदलता चला जाएगा?
दूसरा सवाल उन क्षेत्रीय नेताओं और समाजसेवियों की भूमिका को भी लेकर है जो आज इस मुद्दे को लेकर सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। जबकि उत्तरी हरिद्वार भूपतवाला क्षेत्र में समय समय पर कई आश्रमों की सम्पत्ति को टिकाने लगा दिया गया है क्या वे वास्तव में संपत्ति की सुरक्षा और पारदर्शी जांच की लड़ाई लड़ेंगे या फिर मामला आरोप-प्रत्यारोप और निजी हितों की राजनीति में उलझकर रह जाएगा?
फिलहाल निगाहें प्रशासन पर हैं। यदि अमेरिकन आश्रम की संपत्ति को लेकर लगाए जा रहे आरोपों में दम है तो जिम्मेदार अधिकारियों को तत्काल रिकॉर्ड खंगालकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। और यदि आरोप बेबुनियाद हैं तो प्रशासन को तथ्यों के साथ दूध का दूध और पानी का पानी करना चाहिए।
आखिर सवाल किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि एक ट्रस्ट की संपत्ति की सुरक्षा और उसकी वैधानिक स्थिति का है। अब देखना यही है कि ‘रायता’ फैलाने वालों का पर्दाफाश होता है या अमेरिकन आश्रम की संपत्ति की सुरक्षा के नाम पर उठी आवाजें भी किसी नए सौदे की भेंट चढ़ जाती हैं।
