
लेखिका जूही अग्रहरी
कोलकाता
अधूरा इश्क़
तुम तो चले गए… मैं वीरान हो गई,
इश्क़ के सफ़र में बिल्कुल अनजान हो गई।
तेरे बाद हर खुशी मुझसे रूठ गई,
मेरी हँसी भी जैसे कहीं टूट गई।
जो ख्वाब तेरे संग सजाए थे कभी,
आज वही आँखों में धुआँ बन गए सभी।
तेरी आवाज़ अब भी कानों में रहती है,
पर मेरी दुनिया खामोशी सहती है।
मैंने चाहा था तुझे खुदा की तरह,
पर तू मिला सिर्फ़ सज़ा की तरह।
अब रातें चाँद से बातें करती हैं,
तेरी यादें दिल में आहें भरती हैं।
तू पास नहीं फिर भी लगता है यहीं,
मेरी तन्हाई से पूछ… तू गया ही नहीं।
तेरे बिना ये दिल अधूरा सा है,
हर धड़कन में दर्द बहुत गहरा सा है।
मैंने खुद को भी खो दिया तेरे पीछे,
अब आईना भी पहचानता नहीं मुझे।
इश्क़ मेरा सच्चा था शायद इसी लिए,
तू जीत गया… और मैं हार गई तेरे लिए।
अब किसी से दिल लगाने से डर लगता है,
हर चेहरा तेरे जैसा बेवफ़ा लगता है।
कभी लौट आओ तो देखना मुझे,
मैं आज भी वहीं हूँ…
बस पहले जैसी नहीं रही।
