
हरि न्यूज
“माँ”
माँ क्या लिखूँ तेरे बारे में,
तूने स्वमं मुझे सृजा है।
जैसे प्यार की मेंहदी का रंग,
दोनों हाथों में रचा है।
शनैः शनैः मेहंदी का रंग तो,
माँ फीका पड़ता जाता है।
देख तेरे गालों की लाली से,
प्रभु ने ब्रह्माण्ड रचा है।
जिस घर में माँ का वास नहीं,
वह प्याज के छिलकों-सा बिखरता है।
माँ की देख करुण दशा,
जो बच्चे बिचलित हो जाते हैं।
उनके घर ही सदा लक्ष्मी रहतीं,
प्रभु ने यह विधान रचा है।
छूलो पुण्य- चरण-कमल माँ के यारो,
स्वर्ग वहीं पर दबा पड़ा है।
(अब्दुल सलाम कुरेशी)
जिला-गुना(म.प्र.)

