
अभी कल ही तो माँ ……
अभी कल ही तो माँ मेरे पीछे भागकर खाना खिलाती थी,
आज मैं उसके पास बैठकर दवा याद दिलाती हूँ।
अभी कल ही तो माँ
मुझे बहला कर रोटियाँ खिलाती थी,
आज मैं माँ को अपने हाथों से खिलाती हूँ।
अभी कल ही तो माँ
मुझे नहलाकर मेरे बाल सुखाती थी,
आज मैं माँ को सहारा देकर नहलाती हूँ।
पहले मेरी उंगली पकड़कर चलना सिखाया था उसने,
अब मैं उसका हाथ पकड़कर सीढ़ियाँ उतरवाती हूँ।
पहले रात भर जागकर वो मुझे सुलाती थी,
अब उसकी नींद टूटे तो मैं पानी लाती हूँ।
अभी कल ही तो माँ
मेरे सिर पर हाथ फेरकर मुझे सुकून देती थी,
आज मैं माँ का सिर दबाकर उनका दर्द कम करती हूँ।
पहले डर लगने पर मैं उसकी गोद में छुप जाती थी,
अब उसे डर लगे तो मैं उसका सहारा बन जाती हूँ।
अभी कल ही तो माँ
मेरे पाँव दुखने पर धीरे-धीरे दबा देती थी,
आज मैं माँ के थके हुए पाँव दबाती हूँ।
पहले वो कहती थी — “थोड़ा और खा ले”,
अब मैं कहती हूँ — “माँ, समय से खाना खा लेना।”
पहले मेरी किताबें और बैग संभालती थी,
अब मैं उसका चश्मा और दवाइयाँ रखती हूँ।
पहले मेरी हर जिद पूरी किया करती थी,
अब मैं उसकी छोटी-छोटी खुशियाँ ढूँढती हूँ।
पहले मेरी खामोशी भी समझ जाती थी,
अब मैं उसकी आँखों की थकान पढ़ लेती हूँ।
समय सच में नदी की तरह बह जाता है,
कल जो माँ मेरा बचपन सँभालती थी,
आज मैं उसका बुढ़ापा सँभालती हूँ।
कल मैं उसकी जिम्मेदारी थी,
आज वो मेरी जिम्मेदारी है।
लेकिन एक चीज कभी नहीं बदलती,
उसका प्यार…
जो बचपन में भी वैसा था,
और आज भी वैसा ही है।
रिश्ते वही रहते हैं,
बस किरदार बदल जाते हैं।
माँ तब भी मेरी दुनिया थी,
और आज भी मेरी दुनिया है।
कहते है माँ का दिन है आज
पर ऐसा कौन सा दिन है जो माँ के बिना है ,हम हमारी जिंदगी सबकुछ माँ से है।
हम कितना भी कर ले पर अपनी माँ
का कर्ज कभी नही चुका पायेंगे ।
मेरी तरह सभी को मातृ दिवश की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏
लेखिका जूही अग्रहरी
कोलकाता
